Thursday, June 14, 2018

तकती : बदल जाये अगर माली

#तकती

दोस्तो अदाकारा तनुजा और माला सिन्हा ने 1966 में
आई "फ़िल्म: बहारें फिर भी आएंगी " से धूम मचा दी थी । जब ये गीत उन पर फिल्माया गया उनकी अदा के लोग दीवाने हो गए । इस गीत को आवाज़ देने वाले गायक महेंद्र कपूर उन दिनों मुहम्मद रफी की दूसरी कॉपी नज़र आने लगे थे ओ. पी. नय्यर साहब के संगीत ने इसमें ऐसी जान फूंकी की हर शख्स की ज़ुबाँ पर उन दिनों ये गीत चलने लगा ।

आइए इस गीत की तकती और बहर देखें :

बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं खाली
बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी

(थकन कैसी घुटन कैसी चल अपनी धुन में दीवाने) – 2
(खिला ले फूल काँटों में सजा ले अपने वीराने) – 2
हवाएं आग भड़काएं फ़िज़ाएं ज़हर बरसाएं
बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी ।

1222-1222-1222-1222
(बहरे हजज़ मुसद्दस सालिम ।

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Tuesday, June 12, 2018

तकतीअ : ग़ज़ल : नज़्म

तकतीअ क्या है ?***** #Hint

ग़ज़ल:नज़्म

दोस्तो एक बात तो आप गिरह से बाँध लें कि बिना धुन/बहर के ग़ज़ल को आज़ाद नज़्म कहते है ।
ग़ज़ल नहीं और  सच कहूं तो आज़ाद नज़्म का काव्य में कोई भी स्थान नहीं है । हमारी तकतीअ की श्रृंखला में सबसे महत्वपूर्ण बात पहले हमें शब्द का वज़्न करना आना चाहिए । इस विदा में अगर हम कमजोर हैं तो ग़ज़ल कहना बहुत मुश्किल होगा । इसके लिए हम पहले शब्द को तोड़ेंगे,  जिस आधार पर हम उसका उच्चारण करते हैं । शब्द की सबसे छोटी इकाई होती है वर्ण । तो शब्दों को हम वर्णों मे तोड़ेंगे । वर्ण वह ध्वनि हैं जो किसी शब्द को बोलने में एक समय मे हमारे मुँह से निकलती है और ध्वनियाँ केवल दो तरह की होती हैं या तो छोटी या बड़ी। शब्द देखिये :

जैसे:

बहारो

ब- छोटी ध्वनि
हा- बडी ध्वनि
रो- बड़ी ध्वनि

आदि ।

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तकती : बहारो ने मेरा चमन लूटकर

#तकती

दोस्तो इस खूबसूरत श्रृंखला में और एक गीत आपकी नज़र.... आइए  देखें फिल्मः देवर , गायक हैं: मुकेश, संगीतकारः रौशन, गीतकारः आनंद बक्शी

बोल:

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
किसी ने चलो दुश्मनी की मगर
इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया ।

122-122-122-12

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वही धुन ओर वही बहर । ऊपर की धुन पर ही गुनगुनाइए ।

सुहाना सफर उर ये मौसम हँसी
हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं ।

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Monday, June 11, 2018

तकती : ओ दूर के मुसाफिर :: शिकस्ता बहर

बहरे शिकस्ता
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दोस्तो एक बेहद ही पेचीदा बहर के बारे में बात करते हैं "शिकस्ता बहर"

शिकस्ता बहर के बारे में एक बात ध्यान देने की है कि हर चार रुक्न के बाद एक ’ठहराव’ होना ज़रूरी है जिसे हिन्दी में आप ’मध्यान्तर ’ कह सकते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि आप को जो बात कहनी है वह वक़्फ़ा के पहले हिस्से में [पूर्वार्ध मे] कह लीजिये और दूसरी बात वक़्फ़ा के दूसरे हिस्से [यानी उत्तरार्ध में] कहिए।  इसको बहर में -//  ऐसे दरसगया जाता है । यानी ये नही होगा कि आप की बात ”चौथे और पाँचवे’ रुक्न मिलाकर पूरी हो । यदि ऐसा है तो बहर  ’शिकस्ता’ कहलायेगी और अगर ऐसा नहीं है तो बहर ’शिकस्ता ना-रवा’ कहलायेगी ।

शिकस्ता बहर में एक नग़मा  :
फ़िल्म: उड़न खटोला, गायक/गायिका: मोहम्मद रफ़ी
संगीतकार: नौशाद, गीतकार: शकील बदांयुनी ।

ओ दूर के मुसाफ़िर // हम को भी साथ ले ले
हम को भी साथ ले ले //हम रह गये अकेले ।

221-2122- //-221-2122

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कुछ  और उदाहरण:

*जब से हुई है मेरी शादी-//- आँसू बहा रहा हूँ ।
*गुजरा हुआ जमाना-//- आता नहीं दुबारा ।
*सारे जहां से अच्छा-//- हिन्दूसितां हमारा ।
*छेड़ो न मेरी ज़ुल्फ़ें -//- ये लोग क्या कहेंगे ।

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तकती : अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो

मधुर गीत : तकती

एक और गीत, फ़िल्म- एन ईवनिंग इन पेरिस, गीत- हसरत जयपुरी, संगीत- शंकर जयकिशन, गायक- मोहम्मद रफ़ी ।

अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो,
हमें साथ ले लो जहां जा रहे हो ।

122-122-122-122

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Sunday, June 10, 2018

तकती : मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया

आइए दोस्तो एक पुराने गाने का पोस्टमार्टम उसकी तकती कर करें । एक मनभावन गीत
फ़िल्म- हम दोनो, गीत- साहिर लुधियानवी, संगीत- जयदेव, गायक- मोहम्मद रफ़ी । ।

" मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया"

ये सारा गीत एक ही बहर और एक ही स्केल पर गाया गया ।

बहर :

221-2121-1221-212

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इसी बहर पर आधारित फिल्म : अदालत का  एक और गीत  जिसे उसी धुन पर गुनगुनाइए :

गीतकार : राजेन्द्र कृष्ण, गायक : लता मंगेशकर, संगीतकार : मदन मोहन,

यूँ हसरतों के दाग मुहब्बत में धो लिए
फिर दिल से दिल की बात कही औऱ रो लिए ।

वही धुन वही बहर..... एक दूसरे के पूरक ।

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तकती: हूई शाम उनका ख्याल आया गया है ।

दोस्तो फिर हाज़िर हुआ हूँ एक और गीत लेकर ।

फ़िल्म- मेरे हमदम मेरे दोस्त, गीत- मजरूह सुल्तानपुरी, संगीत- लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गायक- मोहम्मद रफ़ी

ये गीत भी दो बहरों का संगम है गौर कीजियेगा

मुखड़ा :
हुई शाम उनका ख़्याल आ गया
वही ज़िन्दगी का सवाल आ गया

( ख्याला गया )

122-122-122-12

अंतरा :

अभी तक तो होंठों पे था
तबस्सुम का इक सिलसिला ।

122-122-12

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